Wednesday, May 7, 2008

पत्थर दिल होता इलाज

दानापुर का रविन्द्र कुमार अपने सात वर्षीय पुत्र राहुल का इलाज प्रदेश के गौरवशाली मेडिकल कालेज अस्पताल पीएमसीएच के शिशु रोग विभाग में नहीं करा सका, जबकि राहुल को आपात चिकित्सा की जरूरत थी। मंगलवार को जूनियर डाक्टरों ने बीमार बच्चे के पिता-चाचा को मारपीट कर लहूलुहान कर दिया। मरीज के परिजनों को पीटने के बाद जूनियर डाक्टरों ने शिशु रोग विभाग में काम भी बंद कर दिया। बाद में आरजू-मिन्नत के बाद डाक्टर तो काम पर लौट आये, लेकिन डरा-सहमा रविन्द्र बेटे का इलाज कराये बिना चला गया। बात जरा सी थी। डाक्टर साहब से निवेदन किया गया था कि वे दवाओं के नाम फिर से लिख दें और इस बार लिखावट थोड़ी साफ रखें ताकि दुकानदार उन्हें पढ़ सके। इस निवेदन पर डाक्टर का पारा चढ़ गया और चूंकि उनकी जमात एक संगठित ताकत रखती है, इसलिए उन्होंने अपनी तुनुक मिजाजी के लिए हिंसा पर उतारू होने तक की आजादी ले रखी है। उधर मरीज तो बेचारा, निरीह और असंगठित होता है- सब कुछ झेलने को विवश। कभी-कभी जब किसी मरीज के तीमारदार समूह में आते हैं, तब या तो उनका इलाज ठीक से होता है या टकराव की नौबत आने पर वे स्वास्थ्यकर्मियों पर भारी पड़ते हैं। मजबूत तीमारदारों से पिटे-हारे स्वास्थ्यकर्मी हड़ताल के हथियार से सरकार को धमकाते हैं। बीच-बचाव से मामला शांत होता है। यह कहानी स्थान, मरीज, रोग, तीमारदार, डाक्टर आदि के नाम बदल-बदल कर प्रदेश में अक्सर दोहरायी जा रही है। सरकारी अस्पताल तो ऐसे सामान्य नागरिकों की सेवा के लिए में बने हैं,जो प्राय: साधनों के मामले में गरीब होते हैं। उनके पास न धनबल होता है, न जन बल। मंगलवार को ही राज्य सरकार ने गरीबी रेखा से नीचे जीवन बसर करने वाले ऐसे लोगों के लिए सरकारी अस्पतालों में हर तरह की चिकित्सा नि:शुल्क करने का फैसला किया। यह व्यवस्था अगले ही महीने से लागू होने जा रही है, लेकिन जहां सरकारी सेवा की छतरी में आये डाक्टरों का मन इतना बढ़ा हुआ है कि वे दोबारा पर्चा लिखने की बात पर संतुलन खो बैठते हैं, वहां गरीब नवाज सरकार के फैसले जनता के कितना काम आ सकेंगे? आम रोगियों के प्रति पीएमसीएच ही नहीं, प्रदेश के अन्य सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में भी घोर उपेक्षा और लापरवाही का भाव दिखता है।
छपरा के उदय कुमार की बहन रिंकू कुमारी ग्यारह दिनों से पीएमसीएच के टाटा वार्ड में भर्ती थी। 30 अप्रैल की रात में उदय अपनी मरणासन्न बहन की देखरेख करते हुए बेड के नीचे सो गया था। इस छोटी सी गलती पर अस्पताल के सुरक्षा गार्डो ने मरीज के भाई को पीटकर घायल कर दिया। बाद में गार्डो के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करायी गई। उधर, बहन रिंकू की मौत हो गई। हालांकि अस्पताल प्रशासन ने तीन आरोपी गार्डो को हटा दिया और शेष गार्डो को सख्त कार्रवाई की चेतावनी दी, लेकिन डाक्टरों के मामले में तो इतना भी नहीं होता। सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं इसीलिए निष्ठुर घटनाओं की आदी हो चली हैं।

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surendra patel
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